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सीएसआईआर –नेशनल मेटलर्र्जिकल लेबोरेट्री (NML) जमशेदपुर- E-Waste रिसाइकलिंग के लिए एक अनोखा अनुसंधान और विकास संगठन

17 Jul 2017

हम लोग अब डिजिटल युग में जी रहे  हैं । ई-अपशिष्ट रीसाइक्लिंग, एक  नया शब्द है जो आजकल प्रयोग किया जा रहा है। आजकल हम लोग तेज गति से डिजिटल युग में प्रवेश कर रहे  हैं । ई-अपशिष्ट रीसाइक्लिं का मतलब  इलेक्ट्रिकल  उपकरणों का फिर से उपयोग  करना होता है। कहने का मतलब ये कि ऐसे इलेक्ट्रिकल उपकरण  जो  कि अब   उपयोग के लायक नहीं रहा ऐसे इलेक्ट्रॉनिक उपकरण का पुनर्संसाधन ही ई-वेस्ट रीसाइकलिंग है। आम तौर पर ई-कचरे में  टीवी, एयर कंडीशनर, वाशिंग मशीन, आरओ पौधों, इलेक्ट्रिक कुकर आदि के रूप में इस तरह के घरेलू उपकरण ही तो  हैं  साथ ही  सूचना प्रौद्योगिकी उपकरणों और इस तरह के कंप्यूटर, मोबाइल फोन, लैपटॉप, बैटरी, हार्ड डिस्क के रूप में इलेक्ट्रॉनिक सामान ई वेस्ट की श्रेणी में शामिल होते हैं । विश्व स्तर पर, ई-कचरे के रीसाइकलिंग,   तेजी से बढ़ती एक प्रवृत्ति है और ज्यादातर ई-कचरा प्रदूषण के पर्यावरणीय प्रभावों  के बढ़ने मानव और पर्यावरण स्वास्थ्य की रक्षा  को लेकर शुरू की गई है।

रैपिड तकनीकी विकास और बिजली और इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग में उच्च तकनीक नवाचारों की वजह से इन उत्पादों की तेजी से अप्रचलन बढ़  गया है, फलस्वरूप  काफी बड़े पैमाने पर  Waste Electrical and Electronic Equipment (WEEE) आने लगे हैं । यह इलेक्ट्रॉनिक कचरा, धातुओं की एक बड़ी संख्या के साथ  संभावित पर्यावरणीय दूषित पदार्थों को शामिल  करने वालों में  तेजी से उभरते अपशिष्ट  है। धातुओं के वैकल्पिक स्रोत के रूप में ई-कचरा रीसाइक्लिंग के लिए प्रौद्योगिकी का विकास करने के लिए आवश्यक है।

शारीरिक लाभकारी प्रक्रियाओं के लिए सीएसआईआर-राष्ट्रीय धातुकर्म प्रयोगशाला (सीएसआईआर-एनएमएल), जमशेदपुर,   ई-वेस्ट रीसाइक्लिंग के विकास में शामिल  है। संस्थान के इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी (DeITY), विज्ञान और प्रौद्योगिकी (DST) और भूविज्ञान और खनिज संसाधन (KIGAM) के कोरियाई संस्थान विभाग विभाग द्वारा समर्थित विभिन्न कार्यक्रम के माध्यम से  इस क्षेत्र में विशेषज्ञता हासिल की है और इस क्षेत्र में विकास किया है ।

2014   में ही भारत में ई-वेस्ट कचरा 1.4 मीट्रिक टन तक होने का अनुमान था।  और अब  आलम ये है कि 50 फीसदी से कम ई वेस्ट  कचरा रिसाइकलिंग  के लिए उपलब्ध होता है और  नॉन फॉरमल सेक्टर में महज 5 से 10 फीसद ही रिसाइकल हो पाता है। अक्सर  जलाने  और गलाने जैसी  प्रक्रियाओं  से या कहें   अनुचित  तरीके से ई-वेस्ट  से धातु को  निकालने का प्रयास अनौपचारिक क्षेत्र द्वारा किया  जाता है, जो खतरनाक होता है। एक रूप से कहें तो ये  अपनी तरह का  एक प्रकार का  खतरनाक उत्सर्जन है जिसे डाइॉॉक्सिन उत्पन्न करता है । भारी धातुओं  मसलन  कैडमियम, सीसा, पारा, आर्सेनिक और ई-कचरा के कारणों की वजह से  स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए खतरा  को खतरा पैदा हो जाता है । बहुत कम भारतीय कंपनियों  के ई-कचरा पुनर्चक्रण और उसे  निकालने  में शामिल हैं। इसके अलावा अपने देश मे ई वेस्ट कचरा को इकठ्ठा करने की कोई समुचित प्रक्रिया भी मौजूद नहीं  है। सीएसआईआर – एनएमएल  पूर्वी भारत में  ई कचरा को इकठ्ठा करने की प्रकिया में शामिल होना चाहती है या कहें इसकी शुरूआत कर सकती है

सीएसआईआर-एनएमएल उद्यमिता विकास के लिए एक प्रौद्योगिकी व्यापार नवाचार केंद्र यानी  Technology Business Innovation Centre( TBIC)  स्थापित करने  जा रही है। साथ ही- विज्ञान और प्रौद्योगिकी (DST)  के  विज्ञान और प्रौद्योगिकी आधारित उद्यमिता विकास (i-STED) योजना  के तहत   “ई-कचरा प्रबंधन और उद्यमिता विकास” पर  एक कार्यक्रम का आयोजन भी किया जाएगा। इस कार्यक्रम के तहत इन क्रियाकलापों या गतिविधियां होंगी

  • ई-कचरे के घटकों के पुन: उपयोग के लिए सुरक्षित और बेहतर तरीके से संचालन करना होगा
  • भावी उद्यमियों के लिए ई-अपशिष्ट रीसाइक्लिंग उद्यम स्थापित करने के लिए यथार्थवादी व्यापार योजनाएं विकसित होगी
  • पूर्वी भारत में अधिकृत ई-कचरा संग्रह नेटवर्क स्थापित करना और
  • नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र बनाने के लिए स्कूलों, महाविद्यालयों और स्थानीय संस्थानों में विभिन्न प्रकारों की प्रयोगशालाओं की सुविधा प्रदान करना

ये फ़ीचर सीएसआईआर (विज्ञान प्रसार के लिए यूनिट), विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय, नई दिल्ली द्वारा अपलोड किया गया है

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