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राष्ट्रीय सुरक्षित मातृत्व दिवस- हर गर्भवती को मिले पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधा

Superadmin
12 Apr 2017

सतत विकास हेतु आधी आबादी की सुरक्षा बेहद जरूरी

महिलाएं किसी भी समाज की मजबूत स्तंभ होती हैं। जब हम महिलाओं और बच्चों की समग्र देखभाल करेंगे तभी देश का सतत विकास संभव है। एक गर्भवती महिला के निधन से ना केवल बच्चों से माँ का आंचल छिन जाता है बल्कि पूरा का पूरा परिवार ही बिखर जाता है। इसलिए गर्भवती महिलाओं के स्वास्थ्य की उचित देखभाल और प्रसव संबंधी जागरुकता फैलाने के उद्देश्य से हर साल  की तरह 11 अप्रैल को राष्ट्रीय सुरक्षित मातृत्व दिवस मनाया गया। 11 अप्रैल को कस्तूरबा गांधी के जन्म की सालगिरह को राष्ट्रीय सुरक्षित मातृत्व दिवस के रूप में घोषित किया गया है । आधिकारिक तौर पर राष्ट्रीय सुरक्षित मातृत्व दिवस घोषित करने वाला भारत  दुनिया का पहला देश है। इस दिन देश भर में कई कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है ताकि गर्भवती महिलाओं के पोषण पर सही ध्यान दिया जा  सके।

माँ बनना प्रकृति का सबसे बड़ा वरदान माना जाता है लेकिन अपने देश में आज भी यह कुछ महिलाओं के लिए मौत की सजा से कम नहीं है। भारत में हर साल जन्म देते समय तकरीबन 45000 महिलाएं प्रसव के दौरान अपनी जान गंवा देती हैं। देश में जन्म देते समय प्रति 100,000 महिलाओं में से 167 महिलाएं मौंत के मुंह में चली जाती हैं। स्‍वास्‍थ्‍य एवं परिवार कल्‍याण मंत्रालय के मुताबिक भारत में मातृ मृत्‍यु दर में तेजी से कमी आ रही है। वर्ष 2010-12 में मातृ मृत्यु दर 178, 2007-2009 में 212 जबकि 2004-2006 में मातृ मृत्यु दर 254 रही। देश ने 1990 से 2011-13 की अवधि में 47 प्रतिशत की वैश्विक उपलब्धि की तुलना में मातृ मृत्‍यु दर को 65 प्रतिशत से ज्‍यादा घटाने में सफलता हासिल की है।

अशिक्षा, जानकारी की कमी, समुचित स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव, कुपोषण, कच्ची उम्र में विवाह, बिना तैयारी के गर्भधारण आदि कुछ कारणों की वजह से माँ बनने का खूबसूरत अहसास कई महिलाओं के लिए जानलेवा और जोखिम भरा साबित होता है। कई मामलों में माँ या नवजात शिशु या दोनो की ही मौत हो जाती है। ज्यादातर मातृ मृत्यु की वजह बच्चे को जन्म देते वक्त अत्यधिक रक्त स्राव के कारण होती है। इसके अलावा इंफेक्शन, असुरक्षित गर्भपात या ब्लड प्रेशर भी अहम वजहें हैं। प्रसव के दौरान लगभग 30 प्रतिशत महिलाओं को आपात सहायता की आवश्यकता होती है। गर्भावस्था से जुड़ी दिक्कतों के बारे में सही जानकारी न होने तथा समय पर मेडिकल सुविधाओं के ना मिलने या फिर बिना डॉक्टर की मदद के प्रसव कराने के कारण भी मौतें हो जाती है।  जच्चा और बच्चा की सेहत को लेकर आशा कार्यकर्ताओं का अहम रोल होता है लेकिन इनकी कमी से कई महिलाएं प्रसव पूर्व न्यूनतम स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित रह जाती हैं। समस्त मातृ मौतों में से लगभग 10 प्रतिशत मौतें गर्भपात से संबंधित जटिलताओं के कारण होती हैं।

मोदी सरकार ने सत्ता संभालते ही मातृ मृत्यु दर को गंभीरता से लिया और प्रसूति की मौत को कम करने के लिए कई योजनाओं की शुरुआत की। इन योजनाओं ने न केवल समाज में जागरुकता फैला कर महिलाओं का सशक्तिकरण किया गया है बल्कि उनकी जरुरतों को लेकर भी समाज और देश को संवेदनशील बनाया गया है।

1. प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान – पीएमएसएमए देश में तीन करोड़ से अधिक गर्भवती महिलाओं को प्रसव पूर्व देखभाल की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए शुरू किया गया है। इस अभियान के तहत लाभार्थियों को हर महीने की नवीं तारीख़ को प्रसव पूर्व देखभाल सेवाओं (जांच और दवाओं सहित) का न्यूनतम पैकेज प्रदान किया जाएगा। यदि किसी माह में नवीं तारीख को रविवार या राजकीय अवकाश होने की स्थिति में अगले कार्यदिवस पर यह दिवस आयोजित किया जाएगा।

माननीय प्रधानमंत्री जी ने मन की बात की हाल की कड़ी में प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान के लक्ष्य और शुरूआत के उद्देश्य पर प्रकाश डाला तथा निजी क्षेत्र के स्त्री रोग विशेषज्ञों/चिकित्सकों से उनकी स्वैच्छिक सेवाएं देने की अपील की।

इस कार्यक्रम की शुरुआत इस आधार पर की गयी है, कि भारत में हर एक गर्भवती महिला का चिकित्सा अधिकारी द्वारा परीक्षण एवं पीएमएसएमए के दौरान उचित तरीके से कम से कम एक बार जांच की जाए तथा इस अभियान का उचित पालन किया जाए, तो यह अभियान हमारे देश में होने वाली मातृ मृत्यु की संख्या को कम करने में महत्वपूर्ण एवं निर्णायक भूमिका निभाएगा।

स्वास्थ्य मंत्री जे पी नड्डा के मुताबिक प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान (पीएमएसएमए) के तहत मंत्रालय का उद्देश्य स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता और कवरेज में सुधार लाना है। इस संबंध में जागरूकता बढ़ाने के लिए समस्त संचार पैकेज के साथ पीएसएमए वेब पोर्टल और मोबाइल एप की भी शुरुआत की गई है।

2. गर्भवती महिलाओं को 6000 रुपये की वित्तीय सहायता – 31 दिसंबर 2016 को नरेंद्र मोदी द्वारा महिलाओं के लिए नई योजनाओं की घोषणा की गई, जिसमे गर्भावस्था सहायता योजना भी थी। इस योजना की घोषणा प्रसूति मृत्यु दर में कमी लाने के प्रयास के रूप में प्रधानमंत्री द्वारा की गई थी। इस योजना के तहत 6, 000 रुपये की वित्तीय सहायता गर्भवती महिलाओं को अस्पताल में प्रसव के बाद महिला के बैंक खाते में प्रदान की जायेगी।

3. मातृत्व अवकाश – प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने कामकाजी महिलाओं के लिए मातृत्व अवकाश को 12 सप्ताह से बढ़ाकर 26 सप्ताह कर दिया है जिससे औपचारिक क्षेत्र में काम करने वाली करीब 18 लाख महिलाओं को इसका फायदा मिलेगा।  इस संबंध में प्रधानमंत्री ने कहा, दुनिया में शायद दो या तीन ही देश हैं, जो इस मामले में हम से आगे हैं। इस महत्वपूर्ण फैसले का मूल उद्देश्य उस नवजात शिशु की देखभाल, भारत का भावी नागरिक, जन्म के प्रारंभिक काल में उसकी सही देखभाल हो, मां का उसको भरपूर प्यार मिले, तब ये शिशु बड़े हो करके देश की अमानत बनेंगे।

इसके अलावा केंद्र सरकार ने महिला और बच्चों की सुरक्षा और विकास के लिए कई महत्वपूर्ण कार्य किए और कई योजनाओं की शुरुआत भी की। “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ”, सुकन्या समृद्दि योजना, दीनदयाल अंत्योदय योजना, स्वच्छ भारत योजना के जरिए मोदी सरकार ने महिलाओं के विकास के लिए न केवल कई प्रयास किए बल्कि समाज में भी इनसे संबंधित संवदेनशील मुद्दों के प्रति लोगों में जागरुकता लाने में भी सफल रही । इससे समाज में महिलाओं के सम्मान के साथ-साथ उनके आत्मसम्मान में भी बढ़ोत्तरी हुई। साथ ही साथ बाल विवाह के खिलाफ मुहिम और महिला जनन स्वास्थ्य व गर्भाधान को लेकर जागरुकता का भी असर दिखना शुरू हो गया है। हाल के वर्षों में देश ने अनेक सूचकांकों के बारे में महत्वपूर्ण प्रगति की है और देश में नवजात शिशु मृत्यु दर (आईएमआर), मातृ मृत्यु दर (एमएमआर), कुल प्रजनन दर (टीएफआर) जैसे राष्ट्रीय स्वास्थ्य संकेतकों में पर्याप्त प्रगति की है और देश में पांच मृत्यु दरों के अधीन विश्व की तुलना में तेजी से गिरावट आई है।

लेकिन अभी भी इस ओर कई कार्य किए जाने बाकी हैं और महिलाओं को प्रसव के दौरान बचाने की मुहिम के समक्ष कई चुनौतियाँ भी हैं। जिनमें किशोरियों को यौन शिक्षा और स्वच्छता, शारीरिक विकास के लिए सही पोषण, गर्भनिरोधक उपायों की आसानी से उपलब्धता और समुचित जानकारी प्रमुख हैं। इसके साथ ही पूरे देश में, खासकर ग्रामीण इलाकों में प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों और चिकित्सा सेवा उपलब्ध कराए बगैर लक्ष्य को पाना संभव नहीं है।

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