मोदी की गारंटी: सशक्त गाँव, विकसित भारत

विकसित भारत की दिशा में आगे बढ़ते हुए यह आवश्यक है कि हम समय-समय पर यह आत्ममंथन करें कि हमारी सार्वजनिक नीतियाँ और संस्थान आज की वास्तविकताओं के अनुरूप काम कर रहे हैं या केवल अतीत की धारणाओं का बोझ ढो रहे हैं। विकसित भारत – रोजगार एवं आजीविका गारंटी मिशन (ग्रामीण) [वीबी–जी राम–जी] अधिनियम, 2025 का पारित होना ग्रामीण नीति में ऐसे ही एक नए और आवश्यक परिवर्तन का संकेत है।
दशकों तक हमारे गाँवों को मुख्यतः अभाव और संकट के चश्मे से देखा गया। ग्रामीण कल्याण योजनाएँ स्थायी समृद्धि के मार्ग के रूप में न रह कर प्रायः अस्थायी राहत तक सीमित रही। वीबी–जी राम–जी अधिनियम उत्पादकता और दीर्घकालिक विकास को केंद्र में रखते हुए इस सोच में एक निर्णायक बदलाव का प्रतिनिधित्व करता है।
यह परिवर्तन माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के उस विज़न से प्रेरित है, जिसमें हर नागरिक के लिए गरिमा, अवसर और सशक्तिकरण को केंद्र में रखा गया है। साथ ही, माननीय केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान जी के ग्रामीण भारत के गहरे अनुभव ने यह सुनिश्चित किया है कि यह सुधार काग़ज़ी नहीं, बल्कि ज़मीन पर उतरने वाला हो।
सुधार की आवश्यकता
पूर्ववर्ती ग्रामीण रोज़गार गारंटी ढांचे ने आय-सहायता प्रदान करने में भूमिका तो निभाई लेकिन लगभग दो दशकों के अनुभव ने कुछ ऐसी संरचनात्मक सीमाएँ भी उजागर कीं, जिन्हें नज़रअंदाज़ करना संभव नहीं था।
पहले के ढाँचे में परिसंपत्ति निर्माण बिखरा और अल्पकालिक रहा, जिसका गाँवों की दीर्घकालीन विकास ज़रूरतों से सीधा जुड़ाव नहीं बन पाया। प्रशासनिक कमजोरियों के कारण फर्जी जॉब कार्ड, फर्जी लाभार्थी और बढ़े-चढ़े मस्टर रोल जैसी समस्याएँ सामने आईं। मजदूरी भुगतान में देरी से श्रमिकों का भरोसा कमजोर हुआ और रोज़गार गारंटी का मूल उद्देश्य प्रभावित हुआ। लगातार किए गए ऑडिटों में यह स्पष्ट रूप से सामने आया कि पुरानी व्यवस्था की अंतर्निहित डिज़ाइन संबंधी कमियों के कारण गंभीर अनियमितताएँ उत्पन्न हो रही थीं।
इन अनुभवों ने यह स्पष्ट कर दिया कि बदलती ज़मीनी वास्तविकताओं के अनुरूप सुधार अब विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता बन चुका था।
शासन सुधार का एक दशक: परिवर्तन की मज़बूत नींव
इस नए अधिनियम को समझने से पहले यह आवश्यक है कि हम यह भी स्मरण करें कि बीते एक दशक में ज़मीन पर शासन और क्रियान्वयन की तस्वीर किस तरह बदली है। पिछले दशक में शासन की दक्षता में आए सुधारों ने ग्रामीण रोज़गार व्यवस्था को लीकेज और कमजोर निगरानी से निकालकर पारदर्शिता की दिशा में आगे बढ़ाया जिससे योजनाओं का वास्तविक लाभ सीधे श्रमिकों तक पहुँचा है ।
यूपीए सरकार में मनरेगा के तहत जहाँ केवल 1,660 करोड़ व्यक्ति-दिवस का रोजगार सृजित हुआ, वहीं 2014-2026 के बीच यह संख्या 80 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि के साथ बढ़कर 3,210 करोड़ हो गई। साथ ही केंद्र सरकार द्वारा जारी धनराशि ₹2.13 लाख करोड़ से बढ़कर ₹8.54 लाख करोड़ और पूर्ण किए गए कार्यों की संख्या 1.53 करोड़ से बढ़कर 8.62 करोड़ हुई।
ग्रामीण भारत का समग्र परिदृश्य भी इसी अवधि में मौलिक रूप से बदला है। सड़क संपर्क, बिजली, आवास, स्वच्छता, डिजिटल कनेक्टिविटी और वित्तीय समावेशन ने गाँवों के आर्थिक और सामाजिक ढांचे को नया आकार दिया है। इसका प्रत्यक्ष प्रभाव गरीबी में आई ऐतिहासिक गिरावट में भी दिखाई देता है। जहाँ 2011–12 में गरीबी दर 25.7 प्रतिशत थी, वहीं 2023–24 में यह घटकर लगभग 4.86 प्रतिशत रह गई है ।
जहाँ पहले कोई जियो-टैग्ड परिसंपत्ति नहीं थी, आज 6.44 करोड़ से अधिक परिसंपत्तियाँ सार्वजनिक सत्यापन के दायरे में हैं। उसी तरह व्यक्तिगत और आजीविका से जुड़ी परिसंपत्तियों का अनुपात 17.6% से बढ़कर लगभग 63% हुआ है।
इसी मज़बूत आधार पर वीबी-जी राम-जी अधिनियम ग्रामीण सशक्तिकरण के अगले चरण को रूप देता है।
वीबी–जी राम–जी अधिनियम, 2025: प्रमुख प्रावधान और प्रभाव
वीबी–जी राम–जी अधिनियम, 2025 ग्रामीण रोज़गार नीति को अस्थायी राहत से निकालकर संरचित, उत्पादकता–आधारित विकास की दिशा में ले जाता है।
सबसे पहले, यह रोज़गार गारंटी को मज़बूत करता है। प्रत्येक ग्रामीण परिवार के लिए वैधानिक रोज़गार की सीमा 100 दिन से बढ़ाकर 125 दिन कर दी गई है, जिससे आय सुरक्षा और अधिकार दोनों सुदृढ़ होते हैं।
दूसरा, यह अधिनियम कृषि चक्र का सम्मान करता है। बुवाई और कटाई के चरम समय में 60 दिनों का कार्य–विराम अनिवार्य कर यह सुनिश्चित किया गया है कि रोज़गार सहायता खेती का पूरक बने, प्रतिस्पर्धी नहीं।
तीसरा, यह अधिनियम अनिश्चित और विलंबित भुगतानों के दौर का अंत करता है। अब साप्ताहिक अथवा अधिकतम पंद्रह दिनों के भीतर भुगतान अनिवार्य किया गया है, और देरी की स्थिति में स्वतः मुआवज़े का प्रावधान है।
चौथे, 60:40 के केंद्र–राज्य वित्तीय मॉडल के माध्यम से सहकारी संघवाद को मज़बूती दी गई है, जिससे राज्यों की भागीदारी बढ़ेगी और योजनाओं का बेहतर क्रियान्वयन एवं जवाबदेही सुनिश्चित होगी। वहीं, असम सहित सभी पूर्वोत्तर और हिमालयी राज्यों के लिए 90:10 की वित्तीय व्यवस्था इन क्षेत्रों की विशिष्ट भौगोलिक परिस्थितियों और विकासात्मक चुनौतियों के प्रति केंद्र सरकार की संवेदनशीलता को दर्शाती है।
अंततः, यह अधिनियम चार स्पष्ट विकास क्षेत्रों : जल सुरक्षा, मुख्य ग्रामीण अवसंरचना, आजीविका–संबंधी परिसंपत्तियाँ और जलवायु सहनशीलता को परिभाषित करता है। इससे बिखरे और अल्पकालिक कार्यों के स्थान पर योजनाबद्ध परिसंपत्तियाँ बनेंगी ।
विकसित भारत की नींव: सशक्त गाँव
वीबी–जी राम–जी अधिनियम, 2025 मात्र एक नीतिगत संशोधन नहीं है। यह इस बात की पुनर्परिभाषा है कि राज्य ग्रामीण नागरिकों से कैसे जुड़ता है — काम की गरिमा, शासन की जवाबदेही और परिणामों की स्थायित्व के आधार पर।
जैसा कि माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने कहा है, “विकसित भारत के निर्माण के लिए भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था का सशक्त होना जरूरी है।” इसी दृष्टि को नीति और व्यवहार में साकार करने का प्रयास वीबी–जी राम–जी अधिनियम, 2025 के माध्यम से किया गया है। यह अधिनियम दर्शाता है की ग्रामीण अर्थव्यवस्था राष्ट्रीय विकास की परिधि में नहीं, बल्कि उसके केंद्र में है। विकसित भारत @2047 की ओर बढ़ते हुए यह सुधार सुनिश्चित करता है कि हमारे गाँव विकास के केवल दर्शक न रहें, बल्कि आत्मविश्वासी, आत्मनिर्भर और सशक्त साझेदार बनकर राष्ट्र के भविष्य को आकार देने में सक्रिय भूमिका निभाएँ।
