उत्तराखंड की लोक संस्कृति और हरेला – प्रकृति, परंपरा और हमारी पहचान

Blog By - Team MyGov,
July 15, 2026
  • हरेला पर्व उत्तराखंड की समृद्ध लोक संस्कृति, पर्यावरणीय संवेदनशीलता और लोकजीवन का महत्वपूर्ण प्रतीक है, जिसका अर्थ हरियाली, नवजीवन और समृद्धि है।
  • यह पर्व पारंपरिक रूप से कुमाऊँ अंचल में विशेष उत्साह के साथ मनाया जाता है, जो वर्षा ऋतु के आगमन और कृषि चक्र के शुभारंभ का प्रतीक है।
  • हरेला प्रकृति संरक्षण के जनआंदोलन का स्वरूप ले चुका है, जिसके अवसर पर उत्तराखंड सरकार द्वारा राज्यभर में व्यापक वृक्षारोपण अभियान संचालित किए जाते हैं।
  • इन अभियानों में जनप्रतिनिधि, विद्यार्थी, स्वयंसेवी संगठन, महिला समूह, युवा, सरकारी विभाग और आम नागरिक सक्रिय सहभागिता निभाते हैं।
  • राज्य सरकार ने हरेला पर्व के सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व को देखते हुए इस पर सार्वजनिक अवकाश घोषित किया है, तथा मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी ने इसे उत्तराखंड की आत्मा का उत्सव बताया है।

उत्तराखंड की पहचान केवल हिमालय, नदियों और देवस्थलों से ही नहीं है, बल्कि यहां की समृद्ध लोक संस्कृति और प्रकृति के प्रति गहरे सम्मान से भी है। हमारे पर्व केवल उत्सव नहीं, बल्कि जीवन मूल्यों, सामाजिक चेतना और प्रकृति के साथ संतुलित सह-अस्तित्व की जीवंत अभिव्यक्ति हैं। इन्हीं लोकपर्वों में हरेला उत्तराखंड की सांस्कृतिक चेतना, पर्यावरणीय संवेदनशीलता और लोकजीवन का एक महत्वपूर्ण प्रतीक है।

‘हरेला’ का अर्थ ही हरियाली, नवजीवन और समृद्धि है। पारंपरिक रूप से यह पर्व कुमाऊँ अंचल में विशेष उत्साह के साथ मनाया जाता रहा है, किंतु आज यह पूरे उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान बन चुका है। वर्षा ऋतु के आगमन, कृषि चक्र के शुभारंभ और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का यह पर्व हमें अपनी जड़ों से जोड़े रखता है।

हरेला के साथ अनेक लोकमान्यताएँ और सांस्कृतिक परंपराएँ जुड़ी हुई हैं। मान्यता है कि यह पर्व भगवान शिव और माता पार्वती के पावन मिलन तथा सृष्टि में हरियाली और उर्वरता के विस्तार का प्रतीक है। कृषि प्रधान समाज में इसे नई फसल और नए जीवन चक्र के शुभारंभ के रूप में भी देखा जाता है। हरेला से नौ या दस दिन पूर्व घरों में मिट्टी से भरे पात्रों में गेहूँ, जौ, मक्का अथवा धान के बीज बोए जाते हैं। पर्व के दिन अंकुरित हरियाली को परिवार के बड़े सदस्य छोटे सदस्यों के सिर पर रखकर उनके सुख, समृद्धि, उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घायु का आशीर्वाद देते हैं। यह परंपरा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि प्रकृति और परिवार दोनों के प्रति हमारी आस्था का प्रतीक है।

उत्तराखंड के पर्वतीय जीवन में जंगल, जल और जमीन केवल संसाधन नहीं रहे हैं, बल्कि हमारी संस्कृति, आजीविका और अस्तित्व का आधार रहे हैं। यही कारण है कि हरेला हमें प्रकृति के संरक्षण का संदेश देता है। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि यदि प्रकृति सुरक्षित रहेगी, तभी हमारा भविष्य भी सुरक्षित रहेगा। हरेला के अवसर पर गाए जाने वाले लोकगीत, पारंपरिक रीति-रिवाज और सामूहिक आयोजन हमारी सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का कार्य करते हैं तथा सामाजिक एकता को भी सुदृढ़ बनाते हैं।

आज जब पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, पर्यावरणीय असंतुलन और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है, तब हरेला का महत्व और भी बढ़ जाता है। इस लोकपर्व ने समय के साथ स्वयं को केवल एक सांस्कृतिक परंपरा तक सीमित नहीं रखा, बल्कि जनभागीदारी आधारित पर्यावरण संरक्षण के एक प्रभावी अभियान का स्वरूप भी ग्रहण किया है।

 

उत्तराखंड सरकार ने हरेला को प्रकृति संरक्षण के जनआंदोलन के रूप में आगे बढ़ाने का संकल्प लिया है। प्रत्येक वर्ष हरेला पर्व के अवसर पर राज्यभर में व्यापक वृक्षारोपण अभियान संचालित किए जाते हैं, जिनमें जनप्रतिनिधि, विद्यार्थी, स्वयंसेवी संगठन, महिला समूह, युवा, सरकारी विभाग तथा आम नागरिक सक्रिय सहभागिता निभाते हैं। हमारा प्रयास केवल पौधे लगाने तक सीमित नहीं है, बल्कि उनके संरक्षण और संवर्धन को भी जनभागीदारी से जोड़ना है, ताकि आने वाली पीढ़ियों को एक हरित, स्वच्छ और सुरक्षित उत्तराखंड मिल सके।

राज्य सरकार ने हरेला पर्व के सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व को ध्यान में रखते हुए इसे विशेष पहचान प्रदान की है। हरेला पर सार्वजनिक अवकाश घोषित किया जाना इस बात का प्रतीक है कि यह पर्व केवल एक पारंपरिक उत्सव नहीं, बल्कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक अस्मिता, लोकआस्था और पर्यावरणीय चेतना का अभिन्न अंग है। हमारी सरकार लोक संस्कृति के संरक्षण, पारंपरिक पर्वों के संवर्धन और पर्यावरण संरक्षण को समान रूप से प्राथमिकता देते हुए निरंतर कार्य कर रही है।

मेरे लिए हरेला केवल एक पर्व नहीं, बल्कि उत्तराखंड की आत्मा का उत्सव है। यह हमें सिखाता है कि विकास और प्रकृति साथ-साथ चल सकते हैं। हमारी संस्कृति हमें प्रकृति का दोहन नहीं, बल्कि उसका संरक्षण करना सिखाती है। यही हमारी परंपरा है और यही हमारी सबसे बड़ी शक्ति भी।

आइए, इस हरेला हम सभी एक पौधा लगाने, उसकी देखभाल करने और प्रकृति के संरक्षण का संकल्प लें। यही हमारी संस्कृति के प्रति सच्ची श्रद्धा होगी और यही आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारी जिम्मेदारी भी।

लेखक – श्री पुष्कर सिंह धामी, मुख्यमंत्री, उत्तराखंड