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किसानो की आय को दोगुना करना – रणनीति एवं प्रगति की एक झलक

04 Jan 2018

–  श्री राधा मोहन सिंह, कृषि तथा किसान कल्याण मंत्री, भारत सरकार

किसान देश की जीवन रेखा हैं और किसी भी देश का विकास उसके कृषि क्षेत्र के विकास के बिना अधूरा है ।  देश की खाद्य सुरक्षा को सतत आधार पर सुनिश्‍चित करने का श्रेय हमारे किसानों को ही जाता है । आज वस्तुस्तिथि यह है कि भारत न केवल बहुत से कृषि उत्‍पादों में आत्‍म निर्भर व् आत्म संपन्न है वरन बहुत से उत्‍पादों का निर्यातक भी है इन सत्यो के साथ यह भी सच है कि किसान अपने उत्‍पादों का लाभकारी मूल्‍य नहीं पाते हैं। अत: सरकार का मानना है कि कृषि क्षेत्र में इस तरह का चहुमुखी विकास किया जाये की अन्न एवं कृषि उत्पादों के भंडारों के साथ साथ किसान की जेब भी भरे व् उनकी आय भी बढे। इसी आशय के साथ दिनांक 28 फरवरी 2016 को बरेली में आयोजित किसानो की एक रैली में माननीय प्रधानमंत्री जी ने कहा था – “मै वर्ष 2022 तक,जब भारत अपनी आज़ादी की 75वीं सालगिरह मनाये, किसानो की आय को दोगुना करना चाहता हूँ। मैंने इसे एक चुनौती के रूप में लिया है, पर यह केवलएक चुनौती नहीं है । एक अच्छी रणनीति, सुनियोजित कार्यक्रम, पर्याप्त संसाधनों एवं कार्यान्वन में सुशासन के माध्यम से इस लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है”।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि यह एक महत्वाकांक्षी उद्देश्य है और इसके लिए सरकार द्वारा बहु-आयामी रणनीति की आवश्यकता है। अत: इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए माननीय प्रधानमंत्री जी ने ‘सात सूत्रीय’ रणनीति का आह्वान किया है, जिसमे शामिल हैं:

  1. प्रति बूंद अधिक फसल के सिद्धांत पर प्रयाप्त संसाधनों के साथ सिंचाई पर विशेष बल।
  2. प्रत्‍येक खेत की मिटटी गुणवत्ता के अनुसार गुणवान बीज एवं पोषक तत्वों का प्रावधान।
  3. कटाई के बाद फसल नुक्सान को रोकने के लिए गोदामों और कोल्डचेन में बड़ा निवेश।
  4. खाद्य प्रसंस्‍करण के माध्‍यम से मूल्‍य संवर्धन को प्रोत्साहन
  5. राष्ट्रीय कृषि बाज़ार का क्रियान्वन एवं सभी 585 केन्द्रों पर विकृतियों को दूर करते हुए ई – प्लेटफार्म की शुरुआत।
  6. जोखिम को कम करने के लिए कम कीमत पर फसल बीमा योजना की शुरुआत।
  7. डेयरी-पशुपालन, मुर्गी-पालन, मधुमक्‍खी–पालन, मेढ़ पर पेड़, बागवानी व मछली पालन जैसी सहायक गतिविधियों को बढ़ावा देना।

प्रधानमत्री माननीय श्री नरेंद्र मोदी जी के वायदे के मुताबिक 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने की वृहद योजना तैयार करने के लिए सरकार ने 13 अप्रैल 2017 को किसानों  की आय को दोगुना करने के लिए एक समिति का गठन किया जिसमे अर्थशास्त्र एवं संखिय्की विभाग के वरिष्ठ अर्थशास्त्री एवं संखियकी सलाहकार; भारत सरकार के खाद्य प्रसंकरण, फसल, पशु पालन एवं डेरी तथा नीति प्रभागो के संयुक्त सचिव; नीति आयोग के कृषि सलाहकार; बागवानी आयुक्त; राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम के प्रबंधक निदेशक; राष्ट्रीय कोल्डचेन विकास केंद्र के मुख्य कार्यकारी अधिकारी; राष्ट्रीय कृषि आर्थिक एवं नीति अनुसन्धान संस्थान के निदेशक एवं कई अन्य गैर सरकारी सदस्य शामिल किये गए।

कृषि नीति को ‘उत्पादन केंद्रित’ के बजाय ‘आय केंद्रित’ बनाने के लिए इस आठ सदस्‍यीय समिति का मुख्य लक्ष्य कृषि के उन संभावनाशील क्षेत्रों की पहचान करना है जिनमें ज्यादा निवेश होना चाहिए। साथ ही समिति का लक्ष्य आय बढ़ाने के लिए उद्यानिकी और पशुपालन तथा मत्स्यपालन जैसे कृषि संबंधित क्षेत्रों की ओर विविधीकरण पर विचार कर कृषि में जोखिम कम करने के तरीके भी सुझाना है । इसके अतिरिक्त समिति खेती की लागत कम करने और मौसम की अनिश्चितता और कृषि क्षेत्र में दाम में उतार-चढ़ाव से निपट के तरीकों पर भी विचार कर अपनी सिफारिशे रखेगी ।

विस्तृत तौर पर इस समिति के कार्यक्षेत्र में आने वाले विचारार्थ मुद्दों में किसानों/कृषि मजदूरों की वर्तमान आय का अध्ययन करना; मौजूदा आय की ऐतिहासिक बढ़त दर को आंकना; वर्ष 2021-22 तक किसानो/कृषि मजदूरों की आय दोगुनी करने के लिए आवश्यक विकास दर निर्धारित करना तथा इन सभी लक्ष्यों को पूरा करने के लिए अपनाई जाने वाली रणनीतियों  पर विचार करना और निर्धारित कार्यान्वन की समीक्षा के लिए एक संस्थागत तंत्र की सिफारिश करना आदि शामिल है।

सही मायनोंमें कृषि की आय को दोगुना करने के लिए बनाई गई समिति जिसे डी ऍफ़. आई. समिति भी कहा जाता है, के द्वारा तीन क्षेत्रों पर ध्यान केन्द्रित किया गया था – उत्पादकता लाभ, फसल की लागत में कमी और लाभ कारी मूल्य। इस सामरिक ढांचे में चार चिंताओं पर भी विचार किया गया जैसे- टिकाऊ एवं सतत कृषि उत्पादन, किसानों के उत्पाद का मौद्रिकरण विस्तार सेवाओं का पुन: मजबूतीकरण और कृषि को एक उद्यम के रूप में मान्यता प्रदान करना। किसानो की आय को 2015-16 को बेस ईयर मानते हुए वास्तविक आधार पर 2016-17 से 2022-23 तक दोगुना करने के लिए कृषि सिंचाई, ग्रामीण सड़कों, ग्रामीण उर्जा और ग्रामीण विकास में निवेश एवं मुद्रा स्कीम आदि के माध्यम से गैर खेतीबाड़ी से निर्गत को बढ़ाने पर बल दिया गया है ताकि कृषि आय में खेतीबाड़ी की आय तथा गैर खेतीबाड़ी की आय के अनुपात को 60:40 से 70:30 के अनुपात तक लाया जा सके। इसी लिए विकास के प्रमुख स्त्रोतों की पहचान करते हुए स्थाई उत्पादन प्रणाली को अपनाने तथा राष्ट्रीय और राजीय – दोनों स्तरों पर उप क्षेत्रीय बढ़त दर में वृद्धि करने को भी रणनीति का हिस्सा माना गया है।

वर्तमान में चालू योजनाओ को आय संवर्धन के साथ जोड़ने पर भी विशेष बल दिया जा रहा है जैसे कि – उत्पादकता बढ़ोतरी से उत्पादन में वृद्धि के लिए राष्ट्रीय खाद्यसुरक्षा मिशन एव् बागवानी के समेकित विकास के लिए गठित मिशन के क्रियान्वन पर बल दिया गया है ; कृषि लागत में कटौती के लिए मृदा स्वास्थ्य कार्ड व् नीम लेपित यूरिया के इस्तेमाल और हर बूंद से ज्यादा फसल संबंधी योजनाओं को लक्षित किया गया है; लाभकारी आय स्त्रोत  के सृजन के लिए ई-नाम, शुष्क और ठन्डे भंडारण संसाधन, डीईडीफ (डेरी प्रसंस्कन और अवसंरचना विकास कोष), ब्याज की रियाती दरो पर भण्डारण की सुविधाए और कटाई पश्चात् ऋण की सुविधा तथा वार्षिक आधार न्यूनतम सपोर्ट प्राइस बढाने आदि पर जोर दिया गया है तथा जोखिम प्रबंधन एवं स्थाई पद्धतियां अपनाने हेतु प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, परम्परागत कृषि विकास योजना तथा उतरपूर्वी राज्यों के लिये जैविक खेती पर मिशन आदि के माध्यम से सतत कृषि को बढ़ावा दिया जा रहा है ।

कृषि के अतिरिक्‍त किसान के अन्‍य आय के साधनों जैसे पशुपालन, मुर्गीपालन, मधुमक्‍खीपालन, मछलीपालन एवं डेयरी के विकास की विभिन्‍न योजनाओं पर भी सरकार निरंतर कार्य कर रही है। सरकार का मानना है कि किसान की आय में वृद्धि के लिए इन अतिरिक्‍त आय स्रोतों के विकास किए जाने की अत्यंत आवश्‍यकता है। इस हेतु सरकार ने राष्ट्रीय पशुधन मिशन, गोकुल मिशन, नीली क्रांति, मधुमक्‍खी पालन, मुर्गी पालन आदि बहुत सी योजनाएं प्रारंभ की हैं जिनके कारण गत वर्षों में डेयरी, पोल्‍ट्री, मधु मक्‍खी, मत्‍स्‍य पालन क्षेत्र में काफी वृद्धि दर्ज हुई है। राष्‍ट्रीय पशुधन मिशन (एनएलएम) जिसको वर्ष 2014-15 में शुरू किया गया था और इसमें सभी राज्‍यों और संघ शासित क्षेत्रों को कवर किया गया है, में पशुधन उत्‍पादन पद्धति, हितधारकों की क्षमता निर्माण, पशुधन उत्‍पादन और परियोजना में सहायता और सुधार से जुड़े सभी पहलू कवर किए गए हैं। इस मिशन का उद्देश्‍य पशुधन क्षेत्र का सतत विकास करना और गुणवत्‍ताप्रद आहार व चारे की उपलब्‍धता में सुधार करना है। पुरानी दूध प्रसंस्करण इकाइयों के उत्थान, दूध प्रशीतन अवसंरचना एवं इलेक्ट्रानिक दूध मिलावट परीक्षण किट हेतू डेरी प्रसंस्करण एवं अवसंरचना निधि रू. 10,881 करोड़ की राशि से स्थापना की जा रही है।

पूर्वोत्‍तर क्षेत्र में सूअर विकास उप-मिशन के तहत पूर्वोत्‍तर राज्‍य के क्षेत्रों में सूअर पालन के समग्र विकास के लिए सहायता की लगातार मांग की जा रही थी। इस उद्देश्‍य से पूर्वोत्‍तर क्षेत्र के 8 राज्‍यों में भारत सरकार स्‍टेट पिगरी फार्म व जर्मप्‍लाज्‍म के आयात के लिए सहायता प्रदान कर रही है ताकि आजीविका कार्यकलापों के साथ साथ फूड बास्‍केट में प्रोटीन की मात्रा को भी बढ़ाया जा सके। समेकित मात्‍स्‍यिकी विकास व प्रबंधन की व्‍यवस्‍था वाली नई पहल नीली क्रांति जिसमें अंतर्देशीय मात्‍स्‍यिकी, जल कृषि, समुद्री मछली, मैरीकल्‍चर व राष्‍ट्रीय मात्‍स्‍ियकी विकास बोर्ड (एनएफडीबी) द्वारा किए जाने वाले कार्यकलाप शामिल किये गये हैं।

किसानो की आय को दोगुना करने के लिए निर्गत डी.ऍफ़.आई. समिति ने अब तक कई महत्वपूर्ण कार्यो को अंजाम दिया है, जिनमे – निआप (राष्ट्रीय कृषि अर्थिकी एवं नीति अनुसंधान संस्थान), एन.सी.ए.ई.आर एवं एन.सी.सी.डी. की ‘ज्ञान भागीदारो’ के रूप में पहचान; पूर्ण समिति की 6 बैठकों और आंशिक समिति की 30 बैठको का आयोजन; विषय वस्तु विशेषज्ञों को शामिल करते हुए 35 से अधिक समूहों और उप-समूहों का गठन आदि मुख्य रूप से शामिल है।

राज्य वार किसानो की वार्षिक आय गणना पर भी समिति द्वारा अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी गई है। इसके अतिरिक्त नाबार्ड द्वारा एक राष्ट्र-स्तरीय एवं 6 क्षेत्रीय सम्मेलनों का आयोजन किया जा चुका है। साथ साथ राज्यों को भी किसानो की आय को दोगुना करने के उद्देश्य से अपनी रणनीति तैयार करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है और कुछ राज्यों जैसे राजस्थान, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश एवं अरुणाचल प्रदेश ने अपनी रणनीति केंद्र सरकार के साथ साझा भी की हैं। इसके साथ ही राज्य स्तरीय रणनीतियो को तैयार करने के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् द्वारा कुलपतियों की अध्यक्षता में राज्य-समन्वय समितियो का भी गठन किया गया है।  विभिन्न मुद्दों जैसे कृषि मशीनीकरण, सिंचाई, बीज, कीट-नाशको, उर्वरको, विपणन, शोध एवं विकास, ऋण, जैविक खेती, सूचना प्रोद्योगिकी एवं विस्तार जैसे विभिन्न मुद्दों पर मार्च 14 से 21, 2017 के बीच निजी क्षेत्र, सरकारी संगठनों तथा किसान निकायों को शामिल करते हुए ‘स्टेकहोल्डर परिचर्चाओ’ का भी आयोजन किया गया है। किसानो की आय को दोगुना करने बारे नीति आयोग द्वारा तैयार किये गए पालिसी पेपर को भी सभी राज्यों के साथ सांझा करते हुए इसे डी.ऍफ़.आई रिपोर्ट में सम्मलित किया गया है।

डी.ऍफ़.आई समिति ने किसानो की आय को प्रभावित करने वाले विषयों का चयन कर अपनी रिपोर्ट को 14 खंडो की विस्तृत श्रेणी में तैयार करने का निर्णय लिया है। विभिन्न श्रेणियो को बारी-बारी से जारी किया जा रहा है ताकि इच्छुक स्टेक होल्डर्स इसका अध्ययन कर रचनात्मक टिप्पणिया व् सुझाव दे सके। अब तक 5 खंड तैयार कर वेबसाईट पर डाल कर सार्वजनिक किये जा चुके है। क्रियान्वन के अगले चरण में अन्तर-शैक्षणिक वाद-विवाद हेतु आमन्त्रण भी प्रस्तावित है।

इन सभी इनपुट्स के आधार पर डी.ऍफ़.आई. समिति नए साल में अपनी समेकित रिपोर्ट सरकार को सौंप देगी । साथ ही यह समिति अपनी रिपोर्ट को सरकार द्वारा अमल में लाने के लिए अपनी सिफारिशे देती रहेगी एवं चालु कार्यक्रमों का एकीकरण व् क्रमबद्ध संशोधनों के लिए मूल्यांकन करती रहेगी और कृषि को एक व्यवसाय के रूप में बढ़ाने के लिए निरंतर प्रयासबद्ध रहेगी ।

अब तक एकत्रित सूचना एवं परिचर्चाओ के मध्य्नज़र तथा विकास के सात स्त्रोतों जैसे कि- (1) फसल उत्पादकता में सुधार; (2) पशुधन उत्पादकता में सुधार; (3) संसाधन उपयोग दक्षता (लागत, बचत और स्थिरता); (4) फसल सघनता में वृद्धि; (5) अधिक मूल्य वाली फसलो के माध्यम से विविधता; (6) किसानो द्वारा प्राप्त वास्तविक मूल्यों में सुधार; तथा (7) कृषि से गैर कृषि कार्यो में बदलाव को ध्यान में रखते हुए डी.ऍफ़.आई. समिति ने अपनी अंतरिम सिफरिशे सरकार से साँझा की है जिन्हें वर्तमान में चालू योजनाओ के माध्यम से अमल में भी लाया जा रहा है। सारांश में डी. ऍफ़.ई. समिति की मुख्य सिफारिशे एवं अनुशंसाओं की एक झलक निम्नानुसार है –

  1. खेती, पशुधन, गैर-कृषि व्यवसाय, मजदूरी और वेतन की विकास दर के अनुसार जो क्रमश: 3.8%, 14.7%, 0.5% व् 1.6 % है, के आधार पर पशुधन के क्षेत्र पर अधिक बल देना;
  2. कृषि एवं कृषि विकास में निवेश के बीच सकारात्मक सम्बन्ध स्थापित करना ताकि कृषि के लिए सार्वजनिक निवेश, विशेषकर कोर्पोरेट सेक्टर के निवेश में बढ़ोतरी हो;
  3. बाज़ार हस्तक्षेप तथा फसल उत्पादन के बाद की प्रक्रियाओं को प्राथमिकता देना;
  4. किसानो की बची हुई (ज़रूरत से अधिक उपज) की 100% कीमत को उत्पादन पश्चात हस्तक्षेप से केप्चर करना;
  5. किसानो की उपज को रोकने (विद-होल्ड करने) की क्षमता को बढ़ाना;
  6. सूखे एवं गीले भंडारण की बुनियादी अवसरचना को मज़बूत करना;
  7. नई बाज़ार पहलों जैसे इलेक्ट्रॉनिक व्यापार, एकल व्यापारी लाइसेंस, बाज़ार शुल्क के लिए एक मात्र बिंदु, बाज़ार शुल्क पर चेक, अनुबंध खेती को बढ़ावा, कृषि मूल्य प्रणाली मंच/प्लेटफार्म का गठन, प्रत्येक किसान को वैल्यू श्रंखला में एकीकृत करना तथा 25 % विस्तार एवं आत्मा कर्मिओं को विपणन के काम में लगाना आदि शामिल है;
  8. उत्पादन में सतत प्रथाओं जैसे कि जल संरक्षण, एकीकृत खेती प्रणाली, वाटर शेड प्रबंधन, जैविक खेती आदि को लागु करना;
  9. खेत से जुडी गतिविधियों एवं सहायक कृषि क्षेत्रो जैसे मधुमकखी पालन, मशरूम की खेती, खाद बनाना, लाख की खेती, कृषि वानिकी आदि को बढ़ावा देना;
  10. कृषि विस्तार कार्यक्रमों में नई शक्ति डालना जैसे आत्मा व् विस्तार कर्मियों की रिक्तियों को भरने के लिए केंद्र सहयता को 60 से 75 % तक बढ़ाने पर विचार करना, विस्तार कार्यो के लिए मानव शक्ति व् आई. सी.टी. के समावेश पर बल देना; एवं
  11. अन्य संरचनात्मक सुधारो पर ध्यान देना ।

वर्तमान में सरकार के सभी चालु कार्यक्रमों एवं प्रयासों का एक मात्र लक्ष्य है किसान भाइयों की आमदनी को 2022 तक दोगुना करना और इसके लिए समिति की रिपोर्ट के अनुसार जो भी कदम उठाना है, सरकार उसके लिए कृतसंकल्प है। इसी रास्ते पर आगे बढ़ते हुए हमें पूरा पूरा विश्वास है कि आजाद भारत में खुशहाल किसान के लक्ष्य को पाया जा सकता है।

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