स्वामी विवेकानंद की प्रेरणा और अमृत काल के संकल्प

MyGov Team
13 Jan 2023

 

संयुक्त राष्ट्र संघ के निर्णयानुसार सन् 1984 ई. को ‘अन्तरराष्ट्रीय युवा वर्ष’ घोषित किया गया। इसके महत्त्व का विचार करते हुए भारत सरकार ने घोषणा की कि सन 1984 से 12 जनवरी यानी स्वामी विवेकानन्द जयंती का दिन राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में देशभर में मनाया जाएगा। स्वामी विवेकानंद वो विश्वव्यापी विचार है जिसे ना सिर्फ भारत के युवाओं ने बल्कि विश्व के युवाओं ने भी स्वीकार किया है। अज्ञानी लोग जिसे मनुष्य कहते हैं, मैं उस नारायण का सेवक हूँ अर्थात ‘नर सेवा-नारायण सेवा’ का मंत्र देने वाले स्वामी विवेकानंद की आज 160वीं जयंती है। उन्होंने 39 वर्ष 5 माह और 22 दिन का जीवन जिया। लेकिन उनके संसार से जाने के लगभग 120 वर्ष बाद भी न सिर्फ भारत बल्कि विश्व उन्हे एक प्रेरणा के रूप में याद कर रहा है।

भारतीय आत्मा को अक्षुण्ण रखते हुए सार्वभौमिक विचारों से संवाद स्वामी जी की प्रमुख विशेषता रही। उन्होंने कहा था भारत एक बार फिर समृद्धि तथा शक्ति की महान ऊँचाइयों पर उठेगा और अपने समस्त प्राचीन गौरव को पीछे छोड़ जाएगा, भारत पुनः विश्व गुरु बनेगा, जो पूरे संसार का पथप्रदर्शन करने में समर्थ होगा। उन्होंने घोषणा की कि भारत का विश्व गुरु बनना केवल भारत ही नहीं, अपितु विश्व के हित में होगा। स्वामी विवेकानंद ने जो भविष्यवाणी की थी अब सिर्फ उसका सत्य सिद्ध होना शेष है।

वर्तमान का भारत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में जिस दिशा में आगे बढ़ रहा है, वह निश्चित रूप से स्वामी विवेकानंद के स्वप्न की पूर्ति कर रहा है। 15 अगस्त 2022 के स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा दिए गए भाषण में अमृत काल के पाँच संकल्पों को हम स्वामी विवेकानंद के विचारों और प्रेरणा से भी जोड़ कर देख सकते हैं।

पहला संकल्प ‘विकसित भारत’ – अमेरिका से लौटकर स्वामी विवेकानंद ने देशवासियों से आह्वान करते हुए कहा था- नया भारत निकल पड़े मोची की दुकान से, भड़भूँजे के भाड़ से, कारखाने से, हाट से, बाजार से, निकल पडे झोंपड़ियों से, जंगलों से, पहाड़ों से, पर्वतों से और खेत-खलियानों से और पुनः भारत माँ को विश्वगुरु के पद पर आसीन कर दे। वर्तमान में नरेंद्र मोदी का भी मानना यही है कि जनभागीदारी और ‘सबका साथ-सबका विकास’ के मंत्र से ही हम विकसित भारत के महान लक्ष्य को पूरा करेंगे।

दूसरा संकल्प ‘गुलामी से मुक्ति’ 1897 में स्वामी विवेकानंद से किसी ने पूछा, स्वामी जी मेरा धर्म क्या है? स्वामी जी ने उत्तर दिया कि गुलाम का कोई धर्म नहीं होता, अगले 50 वर्षों तक सिर्फ भारत को गुलामी से आजाद कराना ही तुम्हारा धर्म है। स्वामी जी कहा करते थे- कि “हम वो हैं, जो हमें हमारी सोच ने बनाया है, इसलिए इस बात का ध्यान रखिये कि आप क्या सोचते हैं, शब्द गौण हैं, विचार रहते हैं, वे दूर तक यात्रा करते हैं” अर्थात अपने मन मस्तिष्क में गुलामी का कोई भी विचार ना रहने दें। यही बात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कही, हमारे मन के भीतर किसी भी कोने में गुलामी का एक भी अंश न रहे।

तीसरा संकल्प ‘विरासत पर गर्व’ 11 सितंबर 1893 का उनका शिकागो भाषण इस बात का सर्वोत्तम उदाहरण है, जब भारत गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था, तब स्वामी विवेकानंद ने भारत की प्राचीन सभ्यता, संस्कृति, विरासत, अध्यात्म और वैभवशाली इतिहास को अंग्रेजों की ही धरती पर गर्व के साथ बताया। उसके बाद एक बार पुनः भारत को मान-सम्मान मिला, गुलामी के कारण जो हीनता का भाव भारतीयों में आया था वह खत्म हुआ। मानो किसी नए सवेरे ने जन्म लिया। विश्व विजय की इस यात्रा से सभी भारतवासियों में एक नई ऊर्जा की लहर दौड़ पड़ी और भारत फिर से परम वैभव को प्राप्त करने की दिशा में अग्रसर हुआ। यही बात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने कही कि हमें अपने देश की विरासत पर गर्व होना चाहिए। हमें अपने सामर्थ्य पर भरोसा होना चाहिए। इसी विरासत ने भारत को कभी स्वर्ण काल दिया था। हमारी विरासत को विश्व मान रहा है। हम वे लोग हैं जो हर जीव में शिव देखते हैं।

चौथा संकल्प ‘एकता और एकजुटता’-  एकता और एकजुटता पर स्वामी जी का विश्व को संदेश था कि- “जल्द ही हर धर्म की पताका पर लिखा हो विवाद नहीं, सहायता; विनाश नहीं, संवाद; मतविरोध नहीं, समन्वय और शान्ति।”, आज विश्व को आतंकवाद के खिलाफ नरेंद्र मोदी का भी यही संदेश है। स्वामी विवेकानंद ने देशवासियों से कहा था कि इस बात के ऊपर तुम गर्व करो कि तुम एक भारतीय हो और अभिमान के साथ यह घोषणा करो कि हम भारतीय हैं और प्रत्येक भारतीय हमारा भाई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी ‘एक भारत-श्रेष्ट भारत’ के भाव को मन में समेटे हुए कहा कि हमें अपनी देश की विविधता को बड़े उल्लास से मनाना चाहिए। क्योंकि किसी देश की सबसे बड़ी ताक़त उस देश की एकता और एकजुटता में लीन होती है।

पाँचवा संकल्प ‘नागरिकों का कर्तव्य’ स्वामी विवेकानंद द्वारा कृत ‘कर्मयोग’ नामक पुस्तक का चौथा अध्याय है- “कर्तव्य क्या है”। जिसमें उन्होंने जीवन के हर कर्तव्य के बारे में विस्तार से बताया है, स्वामी जी ने उसमें लिखा है कि हमारा पहला कर्तव्य है कि हम अपने प्रति घृणा न करें। उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता का उल्लेख करते हुए कहा है कि जीवन के विभिन्न कर्तव्यों के प्रति मनुष्य का जो मानसिक और नैतिक दृष्टिकोण रहता है, श्रीमद्भगवद्गीता में उन सभी जन्मगत तथा अवस्थागत कर्तव्यों का बारम्बार वर्णन है। उसी प्रेरणा से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि नागरिकों का कर्तव्य देश और समाज की प्रगति का रास्ता तैयार करता है। यह मूलभूत प्रणशक्ति है। देश के मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति भी इससे बाहर नहीं हैं। बिजली की बचत, खेतों में मिलने वाले पानी का पूरा इस्तेमाल, केमिकल मुक्त खेती, हर कीमत पर भ्रष्टाचार से दूरी आदि हर क्षेत्र में नागरिकों की जिम्मेदारी और भूमिका बनती है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा वक्तृत्व भारत की स्वतंत्रता के अमृत काल के संकल्पों में स्वामी विवेकानन्द के ओजस्वी विचार अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं। अपनी आध्यात्मिक शक्ति, गौरवपूर्ण संस्कृति-संस्कारों से ओतप्रोत अद्भुत सामर्थ्य, वैश्विक शांति और सौहार्द के लिए वसुधैव कुटुम्बकम के भारतीय दर्शन और मानव कल्याण की प्रेरणा देने वाले सनातन धर्म के कारण ही भारत विश्वगुरु की प्रतिष्ठा को प्राप्त करेगा।

लेखक: (जी. किशन रेड्डी, भारत सरकार के संस्कृति,पर्यटन एवं पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्री हैं)

 

 

 

 

 

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